1212 1122 1212 22
कोई न रंज न अफसोस है जरा उसको
सहूलतों ने बदल कर है रख दिया उसको/1/
जले है शहर उसे फर्क़ कुछ नही पड़ता
बना दिया है लफंगों ने अब खुदा उसको/2/
ये दौरे हाल भी जो देख शर्मशार नही
स्वीकार कैसे करे दिल ये अब बड़ा उसको/3/
दबा लो दर्द को सीने में बंद रक्खो जुबां
नही है फायदा कुछ रंजो गम दिखा उसको/4/
उम्मीद आस धराशायी हो गये दिल के
तसल्लियों से न अब और बरगला उसको/5/
मुगालता है जिसे जुगनूओं के होने का
उदास रात के मंजर जरा दिखा उसको/6/
हकीकतों से जरा रूबरू तो हो वो भी
जरूरतों के मुहल्ले भी जा घुमा उसको/7/
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