221 2122 221 2122
महरूमियाँ उदासी बेचारगी कमी की
हर पल न कर नुमाइश खुलकर तू बेबसी की/1/
है फिक्र मंद हाकिम तू फिक्र मत जरा कर
चुपचाप बस सहा कर हर चोट जिंदगी की/2/
जिस तौर की है दुनिया उस तौर बस चला कर
मत सोचना कभी भी उकता के खुदखुशी की/3/
कितना हँसी है मंजर पर्दा हटा के देखो
दरकार सख्त है अब तुमको भी रोशनी की/4/
लहज़ा मिज़ाज हर दिन सबके बदलते रहते
करता कहाँ है कोई अब कद्र सादगी की/5/
करती अगर गरीबों की इल्तिजा असर कुछ
हालत न ऐसी होती बदतर यहाँ किसी की/6/
हर दिन नया तमाशा दहलीज पर है तारी
हर दिन चुका रहे बस कीमत हैं गर्दिशी की/7/
हर वक़्त ताक पर ही खुशियाँ रही बिचारी
जीने के वास्ते है जद्दोजहद सभी की/8/
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