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अब रोज़ रोज़ खुद से मुलाकात क्या करूँ
इक बार हो चुकी जो वही बात क्या करूँ/1/
गूंगा नही है वक़्त मेरा मौन है अभी
अच्छे नही है आजकल हालात क्या करूँ/2/
मरना तो रोज़ ही है कभी जी भी लीजिए
मिलते हैं ऐसे मशवरे सौगात क्या करूँ/3/
आयी किसी की याद और आंखें बरस पड़ी
बे वज्ह बे सबब की ये बरसात क्या करूँ/4/
जब जब भी जिंदगी को है देखा करीब से
अपने लगे हैं दूर सवालात क्या करूँ/5/
उलझे मेरे खयाल हैं तेरे खयाल से
सुलझाते उनको बैठा हूँ दिन रात क्या करूँ/6/
आंखों के दर्द पढ़ ले जो उसकी तलाश है
काफ़ी है एक यार ही इफरात क्या करूँ/7/
खोने के बाद ही सदा आता खयाल है
थे कीमती वो रिश्ते वो लमहात क्या करूँ/8/
मिट्टी के गुल्लकों की नही होती है उमर
इतनी सी बात पर भला हैहात क्या करूँ/9/
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