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तल्ख़ी जबान की कोई नश्तर से कम नही
तानों की मार भी किसी पत्थर से कम नही/1/
बाहर से मुस्कुराते हैं भीतर भरे हुए
हालत तो अपनी भी किसी जोकर से कम नही/2/
कागज पे अपने माथे की खुरचन मैं लाया हूँ
कुछ बुदबुदा दो तुम तो वो मंतर से कम नही/3/
सुनकर के नाम फिर वो मेरा खिलखिला दिये
दिल पर लगी जो चोट वो खंजर से कम नही/4/
हल्का लगा है बादलों को भी बरस के खूब
आखिर ये उनका हक किसी अवसर से कम नही/5/
बस कुछ ही जानते हैं वो कुछ जानते नही
ये जानना भी कोई बवंडर से कम नही/6/
मजबूरियाँ थीं कुछ तो इन आंखों की हँसने की
ठहरा हुआ मुआब समंदर से कम नही/7/
कुछ लोग उम्र भर ही दुआओं में रह गये
ऐसा भी वाकिया तो मुकद्दर से कम नही/8/
मुआब - भरा हुआ
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