1222 1222 1222 1222
सलीबों पर हर इक गर्दन जुबां खंजर पे रक्खी थी
जनाजें थीं कतारों पर ये जां ठोकर पे रक्खी थी/1/
उखड़ती सांस के खातिर था भटका दर ब दर इंसा
व्यवस्था वेंटिलेटर पर सियासत सर पे रक्खी थी/2/
जिधर देखो उधर बस मातमी मंजर रहा पसरा
गुजारिश इल्तिजा उम्मीद सब पत्थर पे रक्खी थी/3/
कहीं से रोशनी की कोई किरण भी न दिखती थी
लगाए टकटकी आंखे सदा ही दर पे रक्खी थी/4/
भयावह दौर गुजरा है सभी को ही अभी छू कर
सिहर उठता है मन वो सोच कर जो डर पे रक्खी थी /5/
नही बीते हैं ज्यादा दिन अभी इस बात को यारों
सिसकती भागती खबरें यहाँ दर दर पे रक्खी थी /6/
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