1222 1222 1222 1222
बहुत मग़रूर हो मसरूफ़ हो या बे नज़र हो तुम
सवेरे शाम से दिन रात से यूँ बे ख़बर हो तुम/1/
यूँ जलने को समूचा शह्र धूँ धूँ करके जलता है
न आती आँच तुम तक कोई बिल्कुल बेअसर हो तुम/2/
ज़रूरी है बहुत बुनियाद का मज़बूत होना पर
दरकते ईट गारों का खड़ा इक खंडहर हो तुम/3/
नही पिघले कलपना देखकर भी तुम यतीमों के
बड़े निर्दयी बड़े निष्ठुर बड़े पत्थर जिगर हो तुम/4/
न दामन पर कोई भी दाग़ दिखता भी नही ख़ंजर
सलीक़े से करो हो क़त्ल ऐसे बा हुनर हो तुम/5/
लगाकर आग बस्ती में हवन करती सियासत है
तमाशा चल रहा चारों तरफ ही चश्मतर हो तुम/6/
बदलने से फक़त तस्वीर कब इतिहास बदला है
दरो दीवार पर रोग़न चढ़ा कर बे ख़तर हो तुम/7/
मगरूर - घमंडी
मशरूफ - व्यस्त
बे नजर - अंधा
चश्मतर - भीगी आंखें
बा हुनर - हुनरमंद
बे खतर - खतरे से मुक्त नीडर
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