12122 12122 12122
कराहती कहकहों में दब कर सिसक रही है
लगे है सबको ही मुस्कुराती सुबक रही है /1/
तसल्लियों पर तसल्लियाँ बस मिलीं है अब तक
तलाश में जिंदगी खुशी के भटक रही है/2/
मलाल है आंधियों को इतनी सी बात का बस
हवाओं के बीच लौ दिये की थिरक रही है/3/
इस अंजुमन का तो तौरे दस्तूर ही यही है
ये कितने अहसास रोज़ जाने गिटक रही है/4/
पकड़ के परछाईयों को झूठी उन्ही के पीछे
न जाने कब से ही ये शराफत तुनक रही है/5/
मेरी है पहचान क्या मेरे नाम के अलावा
ये हार है मेरी मुझको तिल तिल चटक रही है/6/
ये इश्क तारी है जबकि दोनों पे क्या हुआ फिर
कि बात किस मसअले पे आ कर अटक रही है/7/
गुजर रही है बड़ी ही जद्दोजहद में सबकी
सलीब हर एक सर पे ही अब लटक रही है/8/
जो छू न पायी बुलंदियांँ कर तमाम कोशिश
वो जिंदगी अब उठा के ऐड़ी उचक रही है/9/
कोई अगर है भला तो क्यूँ है भला वो इतना
यही तो सबकी उधेड़बुन आज तक रही है/10/
बहुत ही कम आजकल मिला करता हूँ मैं खुद में
बता दो ये मौत को कभी से वो तक रही है/11/
No comments:
Post a Comment