221 2121 1221 212
क्या क्या न खेल रोज़ दिखाती ये सायकल
पर काम मेरे खूब बनाती ये सायकल/1/
कितने ही रास्ते नये इसने दिखाए हैं
हमदम केे जैसे पेश है आती ये सायकल/2/
तन्हाईयों के दौर का मेरे बनी गवाह
मुश्किल घड़ी में साथ निभाती ये सायकल/3/
फुर्सत में दोनो साथ गुजारे बहुत समय
मौके पे मेरा मान बढ़ाती ये सायकल/4/
लम्बे सफर से कोई रहा न कभी गुरेज
मंजिल से मेरे मुझको मिलाती ये सायकल/5/
बदले समय के साथ बदल से गये हैं लोग
मुझको मगर है अब भी सुहाती ये सायकल/6/
फिटनिस का मेरे खूब ही रक्खे खयाल है
कसरत बिना करे ही कराती ये सायकल/7/
भुलने न अपने आप को देती मुझे है ये
मुझ तक मुझे ही रोज़ ले जाती है सायकल/8/
No comments:
Post a Comment